महाराष्ट्र की राजनीति में नया भूचाल
महाराष्ट्र के सियासी गलियारों में इस समय हलचल अपने चरम पर है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना यूबीटी को एक और जोरदार झटका लगा है। पार्टी के कद्दावर नेता और विधान परिषद के सदस्य सचिन अहीर ने औपचारिक रूप से एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का दामन थाम लिया है। सचिन अहीर का यह कदम न केवल उद्धव गुट के लिए एक बड़ा नुकसान माना जा रहा है, बल्कि इसे राज्य में आगामी चुनावों से पहले की बड़ी रणनीतिक हलचल के रूप में देखा जा रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अहीर ने शिंदे खेमे में शामिल होने के तुरंत बाद महाराष्ट्र विधान परिषद के उप-सभापति पद के लिए अपना नामांकन भी दाखिल कर दिया है।
आदित्य ठाकरे का तीखा रुख
इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए आदित्य ठाकरे ने अपनी नाराजगी स्पष्ट रूप से जाहिर की है। उन्होंने इस दल-बदल को केवल एक सामान्य राजनीतिक गतिविधि मानने से इनकार कर दिया। आदित्य ठाकरे ने कहा, यह ऑपरेशन टाइगर नहीं है, बल्कि यह ऑपरेशन देवेंद्र फडणवीस है। उन्होंने आगे कहा कि इस घटनाक्रम का शिवसेना यूबीटी की मूल शक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। आदित्य के अनुसार, सचिन अहीर को पार्टी ने हमेशा सम्मान दिया और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी थीं, लेकिन व्यक्तिगत स्वार्थ के चलते उन्होंने पाला बदलना ही उचित समझा। आदित्य ने कहा, अगर पार्टी ने आपको सब कुछ दिया है, तो मुश्किल वक्त में आपको साथ खड़ा होना चाहिए था, लेकिन यह उनके सिद्धांतों की कमी को दर्शाता है।
कौन हैं सचिन अहीर और क्यों महत्वपूर्ण है उनका जाना?
सचिन अहीर को मुंबई के राजनीति का एक मंझा हुआ खिलाड़ी माना जाता है। खासकर वर्ली जैसे महत्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्र में उन्हें आदित्य ठाकरे का बेहद करीबी और दाहिना हाथ माना जाता था। वर्ष 2019 में जब आदित्य ठाकरे ने पहली बार चुनाव मैदान में कदम रखा था, उस समय सचिन अहीर एनसीपी का हिस्सा थे। उन्हें विशेष रूप से शिवसेना में शामिल किया गया था ताकि वे आदित्य ठाकरे के लिए चुनावी प्रबंधन देख सकें। सचिन अहीर के जाने का अर्थ है कि मातोश्री की चुनावी रणनीति को सीधे तौर पर सेंध लगी है। विश्लेषकों का मानना है कि इस घटना से आदित्य ठाकरे की राजनीतिक समझ और उद्धव ठाकरे के दावों पर भी सवाल खड़े हुए हैं।
एकनाथ शिंदे और सहयोगी गुटों की प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने सचिन अहीर का स्वागत करते हुए उन्हें राजनीति का तेंदुलकर करार दिया। शिंदे ने मजाकिया लहजे में कहा कि उन्होंने इस फैसले से एक छक्का मारा है। उन्होंने आगे कहा कि अहीर जमीनी स्तर के कार्यकर्ता हैं और उनकी कार्यशैली जनता को पसंद आती है। शिंदे ने स्पष्ट किया कि अब वे उनकी टीम के खिलाड़ी हैं और बैटिंग, बॉलिंग और फील्डिंग तीनों मोर्चों पर काम करेंगे। वहीं, शिवसेना के मंत्री संजय शिरसाट ने इसे ऑपरेशन इमरजेंसी का नाम दिया। शिरसाट ने कहा कि यह कोई टाइगर ऑपरेशन नहीं है, बल्कि एकनाथ शिंदे की सक्रियता का परिणाम है। हालांकि, उन्होंने साफ किया कि उनका लक्ष्य महाविकास अघाड़ी को पूरी तरह खत्म करना नहीं है, बल्कि नेता खुद उनके साथ जुड़ रहे हैं।
कांग्रेस की हैरानी और महायुति का गणित
इस घटनाक्रम से महाविकास अघाड़ी के अन्य सहयोगी दल भी हैरान हैं। कांग्रेस के नेता अमीन पटेल ने बताया कि कुछ दिन पहले ही वे अहीर के साथ एक बैठक में शामिल हुए थे और उन्हें इस तरह के बदलाव का कोई संकेत नहीं मिला था। दूसरी ओर, महायुति गठबंधन के भीतर भी इस फैसले की चर्चा है। नीलम गोर्हे और कृपाल तुमाने जैसे वरिष्ठ नेता भी डिप्टी चेयरमैन पद की दौड़ में थे, लेकिन एकनाथ शिंदे ने अपनी पार्टी के नेताओं को दरकिनार कर विपक्ष से आए सचिन अहीर को तरजीह दी। यह शिंदे की अपनी राजनीतिक बिसात बिछाने की एक बड़ी कोशिश है।
क्या है ऑपरेशन टाइगर 3 का दावा?
शिंदे गुट के विधायक महेंद्र दलवी ने दावा किया है कि यह केवल शुरुआत है और महायुति का ऑपरेशन टाइगर 3 अब पूरी गति से चल रहा है। उनके अनुसार, आने वाले दिनों में उद्धव गुट के कई अन्य विधायक भी पाला बदल सकते हैं। इससे पहले भी नौ में से छह सांसदों के दल-बदल के बाद उद्धव ठाकरे को बड़ा झटका लग चुका है। निकाय चुनाव और विधानसभा चुनाव के मद्देनजर राज्य की राजनीति में सत्ता का यह उलटफेर आने वाले समय में और भी समीकरण बदल सकता है। फिलहाल आदित्य ठाकरे और उद्धव गुट के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण समय है, जहां उन्हें अपने संगठन को बिखरने से रोकने की बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
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