ब्रिटिश युग के नियमों में कैद बिनहार का भविष्य
आजादी के लगभग 8 दशक बीत जाने के बाद भी क्या कोई इलाका पुराने ब्रिटिश दौर के नियमों और बंदोबस्त के भरोसे चल सकता है? यह सवाल सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन उत्तराखंड के विकासनगर का बिनहार क्षेत्र इस समय इसी कड़वी हकीकत का सामना कर रहा है। आज भी इस पूरे क्षेत्र में भूमि और राजस्व से जुड़े अधिकांश मामले वर्ष 1938 के भूमि बंदोबस्त के आधार पर ही निपटाए जा रहे हैं। नए भूमि बंदोबस्त न होने के कारण यहां जमीनों का रिकॉर्ड पूरी तरह से उलझा हुआ है, जिसका सीधा और अनुचित फायदा भू माफिया उठा रहे हैं। स्थानीय किसान पिछले कई वर्षों से लगातार नए भूमि बंदोबस्त की मांग उठा रहे हैं, लेकिन शासन और प्रशासन के स्तर पर अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है।
84 गांवों पर भारी पड़ रही पुरानी व्यवस्था
बिनहार क्षेत्र में मटोगी, मदर्सू और बानाधार सहित कुल 84 गांव शामिल हैं। हैरानी की बात यह है कि इस पूरे इलाके में आखिरी बार भूमि बंदोबस्त साल 1938 में अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान हुआ था। इसके बाद के दशकों में, विशेष रूप से साल 1991 से 2005 के बीच कागजी खानापूर्ति करने के प्रयास तो किए गए, लेकिन वे प्रयास अधूरे ही रह गए। इसका परिणाम यह है कि आज साल 2026 में भी किसानों के पास अपनी पुश्तैनी जमीन के पक्के और वैध कागजात उपलब्ध नहीं हैं। इस प्रशासनिक ढिलाई का फायदा उठाकर भू माफिया फर्जी तरीके से जमीन की खरीद-फरोख्त कर रहे हैं।
ग्रामीणों का आक्रोश और भू माफिया का खेल
इस विषय पर बातचीत करते हुए स्थानीय निवासी अंकित तोमर ने बताया कि मदर्सू बिनहार क्षेत्र में 1938 से नया भूमि बंदोबस्त न होने के कारण आम जनता बेहद परेशान है। उन्होंने आरोप लगाया कि भू माफिया नक्शों में मौजूद गड़बड़ी का पूरा फायदा उठाकर कृषि पट्टों की अवैध खरीद-फरोख्त करने में लगे हैं। ग्रामीणों ने इस संदर्भ में उपजिलाधिकारी (SDM) को ज्ञापन भी सौंपा है। स्थानीय लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि इस मामले का शीघ्र समाधान नहीं किया गया, तो वे उग्र आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे।
चुनाव बहिष्कार की चेतावनी
अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए ग्रामीण दौलत सिंह पुंडीर ने कहा कि हम लंबे समय से अपनी मूलभूत समस्याओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन पिछले 70 साल केवल अधिकारियों के कोरे आश्वासनों के बीच बीत गए। उन्होंने कहा कि अब हमें समझ नहीं आ रहा कि कार्रवाई कब होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि जिलाधिकारी (DM) और मुख्यमंत्री ने उनकी मांगों को गंभीरता से नहीं लिया, तो बिनहार और आसपास के सभी ग्रामीण आगामी चुनावों का पूर्ण बहिष्कार करेंगे। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि उनके पर्वतीय क्षेत्र को विकासनगर ब्लॉक के मैदानी हिस्से में शामिल कर उन्हें सड़क, स्कूल और अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखा गया है। इस उपेक्षा के खिलाफ अब वे जरूरत पड़ने पर उच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाएंगे।
उर्दू नक्शों की उलझन और प्रशासन का पक्ष
यह मामला केवल पुरानी फाइलों तक सीमित नहीं है, बल्कि भाषा की बाधा ने भी इसे और जटिल बना दिया है। पीड़ित ग्रामीण कई बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा चुके हैं, लेकिन नतीजा जस का तस है। तहसील पहुंचकर ग्रामीणों ने एक बार फिर अपनी नाराजगी दर्ज कराई है। इस पूरे घटनाक्रम पर विकासनगर के एसडीएम विनोद कुमार ने सफाई देते हुए कहा कि सरकारी रिकॉर्ड में कुछ पुराने नक्शे गायब थे और कुछ महत्वपूर्ण कागजात उर्दू भाषा में होने की वजह से पूरी प्रक्रिया अटकी हुई थी। एसडीएम ने बताया कि यह मामला पहले भी उनके संज्ञान में आया था, जिसके बाद जिलाधिकारी को पत्र भेजा गया था। उन्होंने आगे कहा कि पुराने नक्शों के अनुवाद के लिए एक उर्दू अनुवादक की तैनाती की गई है। साथ ही, बंदोबस्त की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने भरोसा दिलाया कि नक्शों की कमी और भाषा संबंधी समस्या को जल्द हल कर लिया जाएगा।
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