धरती का इकलौता सोने की बारिश करने वाला ज्वालामुखी
जब भी हम ज्वालामुखी के बारे में सोचते हैं, तो दिमाग में लावा, राख और जहरीली गैसों का दृश्य उभरता है। लेकिन अंटार्कटिका के रॉस द्वीप पर एक ऐसा पर्वत स्थित है जो इन सब के अलावा एक और चीज के लिए चर्चा में है। माउंट एरेबस नाम का यह ज्वालामुखी दुनिया का सबसे दक्षिण में स्थित सक्रिय ज्वालामुखी है। यह दक्षिणी ध्रुव से लगभग 1350 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और अपनी एक खास खूबी के कारण वैज्ञानिकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इस ज्वालामुखी के भीतर लावा की एक झील हमेशा उबलती रहती है, जो हर वक्त धुआं और गैसें बाहर फेंकती रहती है।
हर दिन हवा में 80 ग्राम सोने की फुहार
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि माउंट एरेबस से निकलने वाले धुएं में शुद्ध सोने के अत्यंत सूक्ष्म कण पाए गए हैं। विभिन्न वैज्ञानिक शोधों और अध्ययनों के अनुसार, यह ज्वालामुखी रोजाना लगभग 80 ग्राम सोने की महीन धूल हवा में छोड़ता है। जब ज्वालामुखी से ये गैसें बाहर निकलती हैं, तो तेज हवाएं इन्हें अपने साथ उड़ा ले जाती हैं। ये सोने के कण हवा के माध्यम से ज्वालामुखी से करीब 1000 किलोमीटर या उससे भी ज्यादा दूर तक की दूरी तय कर सकते हैं। यह प्रक्रिया निरंतर जारी रहती है, जिससे बर्फ की सफेद चादर पर यह बहुमूल्य धातु बिखरती रहती है।
सोना बाहर कैसे आता है?
सामान्यतः सोने का गलनांक बहुत ऊंचा होता है, इसलिए यह इतनी आसानी से पिघलकर गैस में नहीं बदलता कि ज्वालामुखी के तापमान से सीधे बाहर आ सके। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके पीछे एक विशेष रासायनिक प्रक्रिया काम करती है। ज्वालामुखी के अंदर मौजूद मैग्मा में सोना अन्य धातुओं के साथ मिश्रित होता है। सल्फर और क्लोरीन जैसे तत्व इस सोने के साथ मिलकर गोल्ड यौगिक का निर्माण करते हैं। ये यौगिक गैस के रूप में ऊपर की ओर आते हैं और वायुमंडल में पहुंचने पर सोने के कणों का रूप ले लेते हैं।
दूसरे ज्वालामुखियों से क्यों अलग है माउंट एरेबस?
यह सच है कि दुनिया के अन्य सक्रिय ज्वालामुखियों जैसे इटली के एटना, हवाई के किलाऊआ, अलास्का के ऑगस्टीन और मैक्सिको के एल चिचोन में भी सोने के अंश पाए गए हैं। लेकिन वहां सोना मुख्य रूप से रसायनों के एक घटक के रूप में मिलता है। माउंट एरेबस इस मामले में अनूठा है क्योंकि यहां मिलने वाला सोना क्रिस्टल के रूप में प्राप्त होता है। वैज्ञानिक जब माइक्रोस्कोप के जरिए इन कणों की जांच करते हैं, तो वे साधारण धूल के बजाय सुंदर और विशिष्ट आकार वाले क्रिस्टल के रूप में दिखाई देते हैं।
वैज्ञानिकों के लिए अब भी एक पहेली
इस अद्भुत घटना की जानकारी सामने आए हुए 30 साल से भी अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन माउंट एरेबस आज भी विज्ञान की दुनिया के लिए एक बड़ा रहस्य बना हुआ है। शोधकर्ताओं ने ज्वालामुखी के आसपास की बर्फ और 1000 किलोमीटर दूर की हवा के नमूनों का बारीकी से अध्ययन किया है। हालांकि वे यह समझ पाए हैं कि क्रिस्टल का निर्माण गैसों के ठंडे होने से होता है, लेकिन सटीक प्रक्रिया अभी भी स्पष्ट नहीं है।
कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि ये क्रिस्टल सीधे गैस से नहीं बनते, बल्कि पहले लावा झील की सतह पर इनका निर्माण होता है और फिर ज्वालामुखी से निकलने वाली गैसें इन्हें अपने साथ ऊपर की ओर खींच लेती हैं। फिलहाल, यह अंटार्कटिका की बर्फीली दुनिया में छिपा एक ऐसा ज्वालामुखी है जो हर दिन आसमान में सोने की महीन धूल बिखेर रहा है। विज्ञान के तमाम आधुनिक उपकरणों के बावजूद, यह रहस्यमयी पहाड़ आज भी कई अनसुलझे सवालों के जवाब समेटे हुए है।
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