देहरादून की लीची का बढ़ता वैश्विक प्रभाव
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की पहचान एक समय में बेहतरीन लीची के बागों के लिए जानी जाती थी। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में उत्पादन में आई कमी के चलते चर्चा का विषय बनी यह लीची अब एक बार फिर सुर्खियों में है। दून घाटी की खास आबोहवा और यहां की मिट्टी में उगी रसीली लीची अब सात समंदर पार कर सीधे इटली के बाजारों तक पहुंच चुकी है। कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के प्रयासों से देहरादून के उद्यान विभाग ने हाल ही में 1 मीट्रिक टन लीची की पहली खेप इटली के लिए रवाना की है। यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि देहरादून की लीची न केवल अपनी मिठास, बल्कि अपनी अद्वितीय खुशबू के लिए दुनिया भर में मशहूर है।
इतिहास के पन्नों में दून की लीची
देहरादून में लीची का आगमन ब्रिटिश शासनकाल के दौरान हुआ था, जिसका इतिहास 1820 से 1830 के दशक तक पीछे जाता है। उस समय अंग्रेज शासकों और चीनी बागवानों ने दून घाटी में लीची के पौधे लगाए थे। हिमालय की तलहटी से आने वाली शीतल हवाएं और यहां की प्राकृतिक भौगोलिक स्थिति ने इन पौधों के लिए एक वरदान का काम किया। उस दौर में देहरादून की लीची इतनी प्रतिष्ठित थी कि इसे खास तौर पर वायसराय और बड़े ब्रिटिश अधिकारियों के लिए भेजा जाता था। डालनवाला और राजपुर रोड जैसे प्रमुख इलाकों की बसावट के पीछे भी बड़े लीची के बागों को सहेजना ही मुख्य उद्देश्य था।
इटली के साथ नाम की चर्चा
पिछले कुछ महीनों में सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की मुलाकात के बाद मेलोडी शब्द काफी चर्चा में रहा है। लेकिन देहरादून के बागवान इस समय किसी और मेलोडी की नहीं, बल्कि इटली जा रही अपनी मीठी लीची की चर्चा कर रहे हैं। इटली के अलावा अमेरिका और यूरोप के बाजारों में भी देहरादून की लीची की भारी मांग है। यह निर्यात यहां के किसानों और बागवानी विभाग के लिए एक बड़ी सफलता माना जा रहा है।
लीची की प्रमुख किस्में और खासियत
देहरादून स्थित सर्किट हाउस राजकीय उद्यान के प्रभारी दीपक कुकरेती के अनुसार, दून घाटी में कई विशेष प्रकार की लीची उगाई जाती है। उन्होंने बताया कि भले ही समय के साथ उत्पादन में गिरावट आई हो, लेकिन आज भी गुणवत्ता के मामले में दून की लीची का कोई सानी नहीं है। यहाँ उगाई जाने वाली प्रमुख किस्मों में निम्नलिखित शामिल हैं:
- राजसेंटेड लीची: यह सबसे मशहूर किस्म है, जिसे 1910 में सबसे पहले लगाया गया था। इसके नाम के अनुरूप ही इसमें गुलाब जैसी प्राकृतिक खुशबू आती है। पकने के बाद इसके गूदे और रस से एक मोहक सुगंध निकलती है।
- लेट बदाना और कलकतिया: ये किस्में भी अपनी मिठास और विशेष स्वाद के लिए जानी जाती हैं।
इन किस्मों की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसमें बीज (गुठली) का आकार बहुत छोटा होता है, जिससे खाने में गूदा अधिक प्राप्त होता है। यह लीची की देर से पकने वाली किस्म है, जिसकी बाहरी परत गहरे लाल रंग की होती है और अंदर का गूदा अत्यंत रसीला और कोमल होता है।
उत्पादन में कमी और बढ़ती मांग
उद्यान प्रभारी दीपक कुकरेती ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान में देहरादून में लीची का उत्पादन कम हो गया है, जबकि मांग में निरंतर वृद्धि हो रही है। यही कारण है कि स्थानीय बाजार से लेकर अंतरराष्ट्रीय निर्यात तक में इसकी कीमतों और पहुंच पर असर पड़ा है। इससे पहले देहरादून की लीची को लंदन के बाजारों में भी सफलतापूर्वक भेजा जा चुका है। 1910 में राजसेंटेड लीची की शुरुआत के बाद से आज तक इसकी मिठास की विरासत कायम है, जो अब वैश्विक स्तर पर उत्तराखंड की पहचान बन रही है। हिमालय की ठंडी तलहटी में तैयार यह उत्पाद अपनी ताजगी के लिए पूरी दुनिया में सराहा जा रहा है।
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