गौसेवा का अनूठा संकल्प
मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में सेवा भाव की एक मिसाल पेश की गई है। अक्सर लोग सामाजिक कार्यों के लिए बड़े चंदे या सरकारी मदद की उम्मीद करते हैं, लेकिन बुरहानपुर के कुछ समाजसेवियों ने साबित कर दिया है कि अगर मन में सच्ची सेवा हो, तो बिना किसी बड़े आर्थिक आधार के भी समाज में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। यहाँ एक समूह ने अपने घर के खर्चों में कटौती करके बचाई गई राशि से गौसेवा का ऐसा कारवां शुरू किया है, जो आज शहर के सैकड़ों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुका है।
दो दोस्तों से शुरू हुआ सफर
इस गौसेवा के महायज्ञ की शुरुआत समाजसेवी माधव बिहारी अग्रवाल और तेजपाल जी भट्ट द्वारा की गई थी। शुरुआत में इन दो दोस्तों ने मिलकर मात्र 11 गायों की जिम्मेदारी उठाई थी। साल 1998 में जब इस काम की नींव रखी गई, तब परिस्थितियां आसान नहीं थीं। मुकेश अग्रवाल बताते हैं कि शुरुआती वर्षों में व्यावसायिक कारणों से काम सुचारू रूप से नहीं चल पा रहा था, लेकिन इरादे नेक थे। आखिरकार साल 2017 में इसे जन सहयोग के माध्यम से एक नया रूप दिया गया। आज यह संस्था झांझर गौशाला के नाम से जानी जाती है और गौ रक्षक सेवा सदन के रूप में एक बड़े केंद्र के तौर पर उभरी है।
20 हजार स्क्वायर फीट में फैली गौशाला
आज इस गौशाला का विस्तार तेजी से हुआ है। यह गौशाला करीब 3 एकड़ के विशाल प्रांगण में बसी है, जिसमें 20,000 स्क्वायर फीट का एक विशाल टीन शेड और मजबूत बाउंड्री वॉल बनाई गई है। वर्तमान में यहाँ 80 गौवंश सुरक्षित हैं। इस स्थान पर गायों के लिए चारे और पानी से लेकर उनके स्वास्थ्य की देखरेख तक की पूरी व्यवस्था की जाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस सेवा से शहर के 200 से अधिक लोग जुड़े हुए हैं, जो नियमित रूप से अपने घर के खर्चों में से राशि बचाकर दान के रूप में देते हैं। इस एकत्रित राशि से ही गायों का चारा, दवाइयां और अन्य जरूरतें पूरी की जाती हैं।
हर वर्ग का मिल रहा सहयोग
इस सेवा सदन की सबसे खास बात यह है कि यहाँ किसी एक व्यक्ति का एकाधिकार नहीं है, बल्कि समाज के हर तबके के लोग जुड़े हुए हैं। इस मुहिम में डॉक्टर, इंजीनियर, वकील और कई अन्य समाजसेवी शामिल हैं। हर दिन शहर के आम लोग भी यहाँ पहुंचते हैं और अपनी सेवा देते हैं। मुकेश अग्रवाल बताते हैं कि उनकी पूरी टीम अब इस कार्य को आगे बढ़ा रही है। गौशाला में मौजूद 80 गायों की सेवा दिन में दो बार की जाती है, जिसमें स्वयंसेवक पूरे मनोयोग से जुटे रहते हैं।
दूध और गोबर का भी नहीं होता व्यापार
गौशाला के संचालकों का मानना है कि सेवा के काम में व्यापार का कोई स्थान नहीं है। यही कारण है कि यहाँ की गायों से प्राप्त दूध को बेचा नहीं जाता है। आदिवासी क्षेत्रों में संस्कृति को जीवित रखने और जरूरतमंदों तक पोषण पहुँचाने के लिए यह दूध नि:शुल्क वितरित कर दिया जाता है, जबकि गाय के बछड़ों को दूध पिलाकर उनका पालन-पोषण किया जाता है। ठीक इसी तरह, गोबर से बनने वाले कंडों को भी व्यापार के बजाय धार्मिक आयोजनों में नि:शुल्क उपलब्ध कराया जाता है।
घायल गोवंश को मिलता है नया जीवन
इस गौशाला का एक मुख्य उद्देश्य लावारिस और बीमार पशुओं को सहारा देना भी है। जिले के किसी भी हिस्से में यदि कोई गौवंश घायल हो जाता है या किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित हो जाता है, तो उसे यहाँ लाकर उसका इलाज कराया जाता है। टीम का प्रयास रहता है कि गौमाता स्वस्थ होकर दोबारा चलने-फिरने लायक हो सके। इस प्रकार, बुरहानपुर की यह गौशाला केवल एक आश्रय स्थल नहीं, बल्कि एक ऐसा उपचार केंद्र भी है जो मूक जानवरों को संबल प्रदान कर रहा है।
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