इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण कानूनी दृष्टिकोण
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई पत्नी अपने जीवन के कठिन दौर में अपने मायके पर निर्भर है या उसे अपने माता-पिता से सहायता मिल रही है, तो यह तथ्य पति को पत्नी को गुजारा भत्ता देने के कानूनी दायित्व से मुक्त नहीं करता। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि एक पत्नी के माता-पिता की आय को किसी भी स्थिति में पत्नी की स्वयं की आय नहीं माना जा सकता है। यह कानूनी आदेश बुलंदशहर की एक परिवार अदालत के उस फैसले के खिलाफ दायर की गई आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर आया है, जिसमें दिसंबर 2023 में पत्नी के भरण-पोषण के दावे को खारिज कर दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि और पत्नी के आरोप
पीड़ित पत्नी ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि शादी के बाद से ही ससुराल पक्ष द्वारा उसे प्रताड़ित किया जा रहा था। पत्नी का दावा है कि उसके पति, जो सेना से सेवानिवृत्त हैं, ने वैवाहिक संबंधों को समाप्त कर दिया और बाद में उसे जानकारी दी कि उसने किसी अन्य महिला के साथ विवाह कर लिया है। महिला के अनुसार, जनवरी 2020 में उसे बुरी तरह पीटा गया और अपने बच्चों के साथ घर से बाहर निकाल दिया गया। तभी से वह अपने मायके में शरण लिए हुए है और अपने वृद्ध माता-पिता पर पूर्णतः निर्भर है।
पति का पक्ष और परिवार अदालत का तर्क
मामले की सुनवाई के दौरान पति ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया। पति का तर्क था कि पत्नी ने बिना किसी उचित कारण के घर छोड़ा है। उसने यह भी दावा किया कि पत्नी का किसी अन्य व्यक्ति के साथ अवैध संबंध है। पति ने अपनी आर्थिक स्थिति बताते हुए कहा कि सेना में सेवा के दौरान उसके वेतन से प्रतिमाह 11,303 रुपये पत्नी और बच्चों को मिलते थे, जो नवंबर 2020 तक जारी रहे। सेवानिवृत्ति के बाद उसे केवल 21,025 रुपये पेंशन मिलती है और आय का कोई अन्य साधन नहीं है। निचली अदालत ने इन दलीलों को आधार बनाकर पत्नी के दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वह दहेज उत्पीड़न या दूसरी शादी के आरोपों को प्रमाणित करने में विफल रही है।
कानून की व्याख्या और हाईकोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद ने इस मामले की सुनवाई करते हुए परिवार अदालत के दृष्टिकोण को त्रुटिपूर्ण बताया। अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 125 का उद्देश्य निराश्रित पत्नी और बच्चों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना है। न्यायमूर्ति ने कहा कि पति द्वारा लगाए गए अवैध संबंधों के आरोपों के समर्थन में कोई भी स्वतंत्र गवाह या पुख्ता सबूत पेश नहीं किए गए। केवल संदेह या चरित्र हनन के आधार पर एक महिला को गुजारा भत्ता पाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। धारा 125(4) के तहत भत्ता रोकने के लिए अवैध संबंधों का ठोस सबूत होना अनिवार्य है, जो इस मामले में पूरी तरह नदारद था।
गुजारा भत्ता की राशि में की गई वृद्धि
हाईकोर्ट ने बच्चों को मिलने वाले गुजारा भत्ता की राशि पर भी गंभीर टिप्पणी की। परिवार अदालत द्वारा प्रति बच्चा 3,000 रुपये निर्धारित किए गए थे, जिसे हाईकोर्ट ने बेहद कम और अपर्याप्त करार दिया। अदालत ने कहा कि आज के दौर में बच्चों की शिक्षा, स्कूल का परिवहन खर्च, कपड़े, पौष्टिक भोजन और चिकित्सा संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए यह राशि नाकाफी है। अपने 17 जून के निर्णय में हाईकोर्ट ने पति को निर्देश दिया कि वह अब से पत्नी को 5,000 रुपये और प्रत्येक बच्चे के लिए 4,000 रुपये का गुजारा भत्ता प्रतिमाह प्रदान करे। इस फैसले ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वैवाहिक विवादों में महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की रक्षा सर्वोपरि है और मायके की सहायता को पति की जिम्मेदारी का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
https://www.indiatv.in/uttar-pradesh/wife-support-from-her-parents-does-not-absolve-the-husband-of-the-obligation-to-pay-alimony-high-court-decision-2026-06-30-1228238