आत्मनिर्भरता की एक नई कहानी
बिहार के शिवहर जिले के गोसाईपुर गांव की रहने वाली सुमित्रा देवी ने साबित कर दिया है कि सही मार्गदर्शन और थोड़ी सी आर्थिक मदद से जीवन की दिशा पूरी तरह बदली जा सकती है। सुमित्रा देवी के लिए यह बदलाव तब आया जब उन्होंने वर्ष 2023 में सहारा ग्राम संगठन के अंतर्गत जीविका समूह के साथ जुड़ने का फैसला किया। इसके बाद उन्हें HNS योजना के तहत ₹1,00,000 का लोन प्राप्त हुआ, जिसने उनके काम को एक नई गति और विस्तार प्रदान किया। साल 2016 से पारंपरिक खेती में सक्रिय रहने वाली सुमित्रा ने इस धनराशि का बेहद समझदारी से निवेश किया।
लोन का सटीक निवेश
जीविका समूह से मिली इस राशि का उन्होंने अपनी जरूरत के अनुसार बंटवारा किया। लोन मिलने के बाद सुमित्रा ने लगभग 30 से 35 हजार रुपये का निवेश सीधे तौर पर सब्जी की खेती को आधुनिक बनाने और उसे बड़े पैमाने पर करने के लिए किया। बाकी बचे पैसों का उपयोग उन्होंने पशुपालन के क्षेत्र में किया, जिसमें उन्होंने एक दुधारू गाय खरीदी। उनके इस निर्णय ने भविष्य की सफलता की नींव रखी। आज सुमित्रा के पास न केवल खेती का बड़ा दायरा है, बल्कि पशुधन भी उनकी कमाई का एक मुख्य स्रोत बन चुका है।
खेती का बढ़ता दायरा और बंपर कमाई
सुमित्रा देवी का सफर काफी प्रेरणादायक रहा है। पहले उनके पास केवल 1 बीघा भूमि थी, जिस पर वे खेती करती थीं। लोन के बाद उन्होंने अपनी मेहनत और सूझबूझ का विस्तार करते हुए अन्य किसानों से जमीन लीज पर ली और अब वे कुल 6 बीघा जमीन पर खेती संभाल रही हैं। वर्तमान में उन्होंने 2 बीघा भूमि पर विभिन्न प्रकार की हरी सब्जियां लगाई हैं। सब्जी की बिक्री से हुई कमाई का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि सुमित्रा ने अब अपनी खुद की 10 कट्ठा जमीन भी खरीद ली है। उनके खेतों में बैगन, कद्दू, घिउड़ा, कोहरा, कुंदरी, मिर्च और खीरा जैसी सब्जियां प्रचुर मात्रा में उगाई जाती हैं।
कमाई के आंकड़ों की बात करें तो सुमित्रा बताती हैं कि कार्तिक के सीजन में उनकी दैनिक आय ₹10,000 तक पहुंच जाती है। वहीं, सामान्य दिनों में भी वह प्रतिदिन ₹2,000 से ₹4,000 तक की आराम से कमाई कर लेती हैं। सावन के महीने के लिए उन्होंने 2 बीघा में कद्दू की खेती की विशेष तैयारी कर रखी है, जिससे उन्हें अच्छी पैदावार की उम्मीद है।
पशुपालन से त्रिकोणीय मुनाफा
सुमित्रा देवी ने केवल खेती पर ही निर्भर रहना उचित नहीं समझा और व्यवसाय के विविध मॉडलों को अपनाया। लोन से खरीदी गई उनकी पहली गाय के बाद आज उनके पास 3 से 4 मवेशी हो चुके हैं। दूध के व्यवसाय से उन्हें नियमित आमदनी प्राप्त हो रही है। इस अतिरिक्त आय का उपयोग उन्होंने बकरियां खरीदने में किया, जिससे अब उनके पास बकरियों का भी एक झुंड है। वे बताती हैं कि बकरियों और खस्सी के तैयार होने पर उन्हें बाजार में आसानी से ₹10,000 से लेकर ₹16,000 तक में बेच दिया जाता है। खेती, दूध उत्पादन और बकरी पालन का यह त्रिकोणीय मॉडल उन्हें आर्थिक रूप से काफी मजबूत बनाता है।
सामूहिक प्रयास और पारिवारिक योगदान
इस बड़ी सफलता के पीछे सुमित्रा के पूरे परिवार का अटूट समर्थन है। उनके परिवार में उनके पति के साथ तीन बेटे और तीन बहुएं हैं। पूरा परिवार मिलकर सुबह से शाम तक खेतों में सब्जियों की तुड़ाई, मवेशियों की देखरेख और खेती से संबंधित अन्य कार्यों में जुटा रहता है। सामूहिक प्रयास और जीविका समूह के सहयोग ने गोसाईपुर की इस महिला को पूरे क्षेत्र के लिए एक मिसाल बना दिया है। रूबी शाही HMS MRP के मार्गदर्शन और जीविका की सहायता ने सुमित्रा की मेहनत को एक नया आयाम दिया है। आज सुमित्रा देवी उन सभी ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं जो अपने दम पर कुछ करना चाहती हैं और आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त करना चाहती हैं।
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