शाही परंपरा और आधुनिक तकनीक का संगम
नैनीताल की यात्रा पर जाने वाले पर्यटकों के लिए यहां की खूबसूरती को कैमरे में कैद करना सबसे जरूरी होता है। पहाड़ों की वादियों में इन दिनों सैलानियों पर पारंपरिक और शाही लिबास का जादू सिर चढ़कर बोल रहा है। पिछले 50 सालों से चली आ रही यह अनूठी परंपरा आज के डिजिटल युग में भी उतनी ही हिट है। लोग आधुनिक कपड़ों के बजाय कुमाऊंनी और गढ़वाली संस्कृति से जुड़े लहंगे और राजसी राजसी पोशाक पहनकर तस्वीरें खिंचवाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं।
बदल गया है तकनीक का तरीका
फोटोशूट के इस सफर की शुरुआत दशकों पहले रील वाले कैमरों से हुई थी, लेकिन वक्त के साथ इसमें काफी बदलाव आए हैं। अब यहां हाई टेक प्रिंटिंग तकनीक का इस्तेमाल होता है, जिससे पर्यटकों को अपनी यादें संजोने के लिए घंटों इंतजार नहीं करना पड़ता। आज स्थिति यह है कि फोटो खिंचवाने के कुछ ही मिनटों के भीतर पर्यटकों को उनकी यादगार तस्वीरें हाथों-हाथ मिल जाती हैं।
पर्यटकों के लिए खास अनुभव
नैनीताल पहुंचने वाले सैलानी इन पारंपरिक पोशाकों को पहनकर खुद को राजा या रानी के शाही अंदाज में महसूस करते हैं। यह ट्रेंड न केवल पर्यटकों की यात्रा को यादगार बना रहा है, बल्कि स्थानीय फोटोग्राफर्स के लिए कमाई का बड़ा जरिया भी साबित हो रहा है। इस काम में लगे कई परिवारों की रोजी-रोटी इसी पारंपरिक व्यवसाय पर टिकी है, जो बदलते समय के साथ खुद को अपडेट कर रहे हैं।
स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान
यह फोटोशूट का चलन न केवल पर्यटन को बढ़ावा दे रहा है, बल्कि स्थानीय संस्कृति को भी संरक्षित कर रहा है। पहाड़ों पर जाने वाले पर्यटक जब पारंपरिक वेशभूषा में फोटो लेते हैं, तो वे यहां की लोक संस्कृति से भी गहराई से जुड़ते हैं। 50 वर्षों से अधिक समय से बरकरार यह परंपरा आज भी नैनीताल के पर्यटन उद्योग का एक अभिन्न और अनिवार्य हिस्सा बनी हुई है।
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