पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में विद्रोह की गूंज और पुरानी साजिश
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK में इन दिनों भारी विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहा है। वहां की जनता सड़कों पर उतरकर आजादी के नारे बुलंद कर रही है और अपनी बुनियादी मांगों के लिए आवाज उठा रही है। इन विद्रोही सुरों को कुचलने के लिए पाकिस्तान ने वही पुराना और बेहद विवादास्पद पैंतरा अपनाया है, जो वर्ष 1947 में मोहम्मद अली जिन्ना ने पूरी कश्मीर रियासत को अपने पाले में लाने के लिए इस्तेमाल किया था। पाकिस्तान ने PoK की ओर जाने वाली रसद, खाने-पीने का सामान और पेट्रोल-डीजल की आपूर्ति पर रोक लगा दी है। उनका मकसद साफ है कि लोगों को बुनियादी सुविधाओं के अभाव में घुटनों पर लाकर झुकने के लिए मजबूर किया जाए। यह एक ऐसी कायराना चाल है जिसे इतिहास के पन्नों में बहुत कम लोग अब याद रखते हैं, लेकिन इसके पीछे की साजिश आज भी उतनी ही खतरनाक है।
1947 में महाराजा हरि सिंह को फंसाने की बिसात
आज की पीढ़ी शायद इस बात से अनजान है कि बंटवारे के वक्त कश्मीर की भौगोलिक स्थिति कैसी थी। आम धारणा यह बन गई है कि जम्मू-कश्मीर सीधे भारत के ऊपर स्थित है, लेकिन उस समय भारत से कश्मीर तक पहुंचने का कोई पक्का और सुलभ रास्ता नहीं था। महाराजा हरि सिंह ने 15 अगस्त तक यह तय नहीं किया था कि उनकी रियासत भारत में जाएगी, पाकिस्तान में रहेगी या फिर स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखेगी। उस दौर में कश्मीर तक पहुंचने का एकमात्र प्रमुख रास्ता रावलपिंडी होकर जाता था, जो उस समय पाकिस्तान का हिस्सा बन रहा था।
श्रीनगर को रावलपिंडी से जोड़ने वाला झेलम वैली रोड ही जीवन रेखा था। इसी सड़क के जरिए ट्रक, बस और राशन की गाड़ियां आती थीं। उस वक्त न तो भारत से कश्मीर तक कोई रेल संपर्क था और न ही कोई आधुनिक हाईवे। पठानकोट तक रेल लाइन थी, लेकिन आगे का रास्ता कठिन पहाड़ों, नदियों और दुर्गम रास्तों से भरा था। सियालकोट से जो रेल लाइन आती थी, वह भी बंटवारे के बाद पाकिस्तान के हिस्से में चली गई। ऐसी स्थिति में महाराजा हरि सिंह के पास व्यापार और आपूर्ति बनाए रखने के लिए पाकिस्तान के साथ एक 'स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट' यानी यथास्थिति समझौता करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।
पेट्रोल और राशन को हथियार बनाना
जैसे ही अगस्त 1947 का महीना बीता और सितंबर आया, पाकिस्तान ने अपनी असली मंशा जाहिर करना शुरू कर दिया। पाकिस्तान ने कश्मीर की जीवन रेखा को बाधित करना शुरू कर दिया। पहले रावलपिंडी की ओर से आने वाले ट्रकों को रोकना शुरू किया गया। बहाने बनाए गए कि नया देश बनने के कारण कागजी कार्रवाई जरूरी है या फिर पंजाब में हो रहे दंगों के कारण माल लूटा जा रहा है। धीरे-धीरे पेट्रोल की आपूर्ति काट दी गई, फिर नमक और आटा भी मिलना बंद हो गया। पाकिस्तान का उद्देश्य स्पष्ट था कि सर्दियों के आने से पहले कश्मीर को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया जाए ताकि वहां की जनता और सेना राशन और ईंधन के अभाव में बेबस हो जाए।
जिन्ना की सोची-समझी कूटनीति
अक्टूबर आते-आते यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि पाकिस्तान कश्मीर को ब्लैकमेल करके विलय के लिए मजबूर करना चाहता है। सर्दियों में पहाड़ी इलाकों में राशन और ईंधन के बिना टिकना नामुमकिन था। गोदाम खाली हो रहे थे और पाकिस्तान समर्थित तत्व वहां विद्रोह की आग सुलगाने में लगे थे। यह जिन्ना की सोची-समझी चाल थी ताकि महाराजा को भारत की शरण में जाने के बजाय पाकिस्तान के सामने झुकना पड़े। 22 अक्टूबर 1947 की रात को पाकिस्तान ने अपना मुखौटा उतार दिया। भारी हथियारों से लैस पाकिस्तानी सैनिक कबायलियों का भेष बदलकर मुजफ्फराबाद के रास्ते कश्मीर में घुस आए। वे लूटपाट और कत्लेआम मचाते हुए श्रीनगर की ओर बढ़ने लगे।
पाकिस्तान की चाल का उल्टा असर
पाकिस्तान की यह कायराना साजिश अंततः उन्हीं पर भारी पड़ गई। अपनी रियासत पर हमला होते देख महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी और कश्मीर का भारत में विलय कर दिया। भारतीय सेना के जांबाज जवानों ने श्रीनगर पहुंचकर पाकिस्तानी हमलावरों को मुंहतोड़ जवाब दिया। बारामूला तक पहुंच चुके हमलावरों को भारतीय सैनिकों ने अपनी वीरता और हवाई मदद से रोक दिया। इसके बाद जो हुआ, वह इतिहास है और आज की लाइन ऑफ कंट्रोल यानी LoC उसी संघर्ष का परिणाम है।
आज भी वही पुराना पैंतरा
आज फिर से वही स्थिति बन रही है। PoK में पेट्रोल और राशन को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। पाकिस्तान की सरकार आज भी उसी पुरानी मानसिकता के साथ काम कर रही है जिससे उसने महाराजा हरि सिंह को धमकाया था। दुनिया के सामने खुद को 'आजाद कश्मीर' का रक्षक बताने वाला पाकिस्तान असल में वहां की जनता को ब्लैकमेल कर रहा है। वह अच्छी तरह जानता है कि भौगोलिक रूप से उस क्षेत्र को नियंत्रित करने का कोई अन्य तरीका उसके पास नहीं है। यह उन लोगों के लिए एक कड़ा सबक है जो पाकिस्तान के शासन को प्रगतिशील मानते हैं। जिस तरह से आज वहां के नागरिक सड़कों पर आकर विरोध कर रहे हैं, वह दर्शाता है कि दमन की यह नीति अब अधिक दिनों तक चलने वाली नहीं है। इतिहास खुद को दोहरा रहा है और इस बार जनता का आक्रोश पाकिस्तान के लिए भारी पड़ सकता है।
https://hindi.news18.com/news/knowledge/pakistan-rations-and-petrol-plan-to-stop-pok-protest-the-same-78-year-old-tactic-jinnah-used-to-force-hari-singh-to-yield-in-kashmir-explained-10614470.html