सावधान! दूध दुहने की ये आम गलती कहीं आपके पशु को अपंग न बना दे, डॉक्टर से जानिए सही तरीका

पशुपालन के दौरान दूध निकालने की गलत विधि आपके दुधारू पशुओं के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। विशेषज्ञों की सलाह है कि सही तकनीक अपनाकर न केवल पशुओं को बीमारियों से बचाया जा सकता है, बल्कि दूध उत्पादन में भी बढ़ोतरी की जा सकती है।

दूध निकालने की गलत तकनीक का दुष्प्रभाव

क्या आप भी अपनी गाय या भैंस का दूध निकालते समय वही पुरानी और गलत विधि अपना रहे हैं? अगर ऐसा है तो आपको तुरंत सावधान होने की जरूरत है। पशुपालन के जानकारों और डॉक्टरों का मानना है कि दूध निकालते समय की गई एक छोटी सी लापरवाही आपके सीधे-साधे और कीमती पशु को हमेशा के लिए अपंग बना सकती है। अक्सर जानकारी के अभाव में हमारे डेयरी किसान भाई दूध दुहने के लिए गलत तौर-तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। इसका सीधा असर न सिर्फ दूध के कुल उत्पादन पर पड़ता है, बल्कि पशु कई प्रकार की गंभीर और कष्टदायक बीमारियों का शिकार भी हो जाता है। पशुपालन विशेषज्ञों का यह साफ कहना है कि दूध निकालने का वैज्ञानिक और सही तरीका न केवल आपके मुनाफे को दोगुना करने की क्षमता रखता है, बल्कि पशु को अनावश्यक डॉक्टरी खर्चों से भी बचा सकता है।

फाल्स मेथड यानी गलत तरीका क्यों है खतरनाक

पशु चिकित्सालय प्रभारी डॉक्टर बृहस्पति भारती ने इस विषय पर विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बड़ी संख्या में लोग अंगूठा विधि से दूध निकालते हैं। विज्ञान की भाषा में इसे फाल्स मेथड कहा जाता है। इस तरीके में अंगूठे को मोड़कर थन पर लगातार कड़ा दबाव डाला जाता है। यह दबाव थन के अंदर मौजूद बेहद कोमल ऊतकों और सूक्ष्म नसों को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर देता है। लंबे समय तक ऐसा करने का परिणाम यह होता है कि थन के भीतर सख्त गांठें बन जाती हैं, जो अंततः दूध आने वाले रास्ते को पूरी तरह से अवरुद्ध कर देती हैं। इस गलत आदत के कारण थनों का प्राकृतिक आकार बिगड़ जाता है, दूध की धार टेढ़ी-मेढ़ी निकलने लगती है और पशु असहनीय दर्द से जूझने लगता है। इतना ही नहीं, इस प्रक्रिया से खून का थक्का जमने और भारी सूजन के साथ-साथ जानलेवा व संक्रामक थनैला रोग होने का खतरा सबसे ज्यादा बढ़ जाता है। इस बीमारी के चलते थन हमेशा के लिए बेकार या मरा हुआ भी हो सकता है, जो पशुपालक के लिए भारी आर्थिक नुकसान का कारण बनता है।

ट्रू मेथड: बछड़े जैसा प्राकृतिक अनुभव

पशुओं के बेहतर स्वास्थ्य और अधिक दूध उत्पादन को सुनिश्चित करने के लिए हमेशा ट्रू मेथड यानी हाथों के पंजे का उपयोग करके दूध निकालने का तरीका अपनाना सबसे श्रेष्ठ होता है। इस वैज्ञानिक तकनीक में थन पूरी तरह से हथेली और उंगलियों के बीच सुरक्षित रहता है। जब आप इस तरह से दूध निकालते हैं, तो थन के प्रत्येक हिस्से पर समान दबाव पड़ता है। पशु को इस प्रक्रिया के दौरान ऐसा महसूस होता है जैसे उसका बछड़ा दूध पी रहा हो। इस प्राकृतिक अहसास के कारण पशु बिना किसी तनाव के पूरी तरह से दूध छोड़ देता है। यह वैज्ञानिक तरीका थन के अंदरूनी कोमल ऊतकों को चोट और गांठ बनने से बचाता है, जिससे थनैला जैसे घातक रोग का खतरा लगभग समाप्त हो जाता है और थनों की उत्पादकता लंबे समय तक बनी रहती है।

5 से 7 मिनट का गोल्डन रूल

दूध दुहने के दौरान समय और गति का विशेष ध्यान रखना अनिवार्य है। डॉक्टर भारती के अनुसार दूध निकालने की प्रक्रिया हमेशा जल्दबाजी में नहीं, बल्कि उचित गति के साथ करनी चाहिए, क्योंकि दूध देते समय पशु का दिमाग केवल 5 से 7 मिनट तक ही ऑक्सीटोसिन हार्मोन रिलीज करता है। यदि आपकी दूध निकालने की गति धीमी है, तो गाय या भैंस कुछ समय बाद दूध लेट डाउन करना बंद कर देती है, जिसे स्थानीय भाषा में दूध चढ़ाना कहा जाता है। इसके अलावा, जिस स्थान पर दूध निकाला जाता है, उस पूरी डेयरी को साफ-सुथरा रखना चाहिए ताकि क्लीन मिल्किंग की प्रक्रिया सुनिश्चित हो सके।

दूध निकालने के बाद रखें ये सावधानियां

दूध निकालने से पहले और बाद में थनों को साफ पानी या एंटीसेप्टिक स्प्रे और लोशन से अच्छी तरह साफ करना बहुत जरूरी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दूध निकालने के तुरंत बाद थन के छिद्र या पोर्स काफी देर तक खुले रहते हैं। इसलिए मिल्किंग समाप्त होने के बाद पशु को कम से कम एक से दो मिनट तक जमीन पर बैठने न दें। यदि पशु दूध निकालने के तुरंत बाद बैठ जाता है, तो नीचे फैली गंदगी और गोबर के हानिकारक बैक्टीरिया इन खुले छिद्रों के माध्यम से सीधे थन के अंदर चले जाते हैं। यह स्थिति थनैला रोग के पनपने के लिए सबसे अनुकूल होती है, इसलिए पशु को खड़े रहने के लिए प्रोत्साहित करना ही समझदारी है।

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