बेशर्म के पौधे का महत्व
अक्सर सड़कों के किनारे या खाली पड़ी जमीनों पर बड़ी आसानी से उगने वाला बेशर्म का पौधा देखने में भले ही साधारण लगे, लेकिन ग्रामीण भारत में इसे एक अचूक देसी औषधि के रूप में देखा जाता है। इसे बेहया के नाम से भी जाना जाता है। बिना किसी खास देखभाल के सालभर हरा-भरा रहने वाला यह पौधा अपनी औषधीय विशेषताओं के कारण लंबे समय से पारंपरिक चिकित्सा का हिस्सा रहा है। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि इसके गुणों का लाभ उठाते समय भी हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जहरीले डंक या किसी गंभीर बीमारी की स्थिति में इसे डॉक्टर के इलाज का विकल्प नहीं, बल्कि प्राथमिक उपचार के रूप में ही देखा जाए।
सूजन और जोड़ों के दर्द में कारगर
ग्रामीण क्षेत्रों में सूजन और दर्द से राहत पाने के लिए बेशर्म की पत्तियों का इस्तेमाल एक भरोसेमंद नुस्खा है। शरीर के किसी भी हिस्से में सूजन होने पर इसके ताजे पत्तों को हल्का गर्म करके उस जगह पर बांधने से अद्भुत परिणाम मिलते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस पौधे में कुछ ऐसे प्राकृतिक यौगिक होते हैं जो एंटी इंफ्लामेटरी गुणों से भरपूर होते हैं। खासकर सर्दियों के दिनों में जब जोड़ों का दर्द बढ़ जाता है, तब लोग इसकी पत्तियों पर सरसों का तेल और थोड़ा सा नमक लगाकर गर्म करते हैं और फिर उसे प्रभावित जोड़ पर लपेट लेते हैं। इस प्रयोग से पुरानी से पुरानी सूजन भी तीन से चार घंटे के भीतर कम होने लगती है।
बिच्छू के डंक का देसी इलाज
बरसात के दिनों में ग्रामीण अंचलों में बिच्छू का डंक मारना एक आम समस्या बनी रहती है। बिच्छू के काटने पर होने वाला असहनीय दर्द बहुत कष्टकारी होता है। ऐसे में वहां के लोग तत्काल राहत पाने के लिए बेशर्म के पौधे से निकलने वाले सफेद रस या दूध का उपयोग करते हैं। जिस स्थान पर बिच्छू ने डंक मारा है, वहां इसके दूध को लगाने से दर्द में तेजी से कमी महसूस होती है। यह एक प्रकार का प्राथमिक उपचार है, जिसके बाद लोग अपनी सुरक्षा के लिए तुरंत पास के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र या डॉक्टर के पास इलाज के लिए जाना सुनिश्चित करते हैं ताकि संक्रमण का खतरा न रहे।
चर्म रोगों के लिए रामबाण
बेशर्म के पौधे में एंटीबैक्टीरियल और एंटीफंगल तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो विभिन्न प्रकार की त्वचा संबंधी समस्याओं को दूर करने में सक्षम हैं। ग्रामीण चिकित्सक इसे एक प्राकृतिक देसी क्रीम की तरह इस्तेमाल करते हैं। दाद, खुजली और फोड़े-फुंसी जैसी समस्याओं में इसका लेप काफी असरदार होता है। विटिलिगो जैसी गंभीर त्वचा रोग की स्थिति में इसकी जड़ को सुखाकर उसका पाउडर बनाया जाता है। इस पाउडर को कपूर और कोकड़े के तेल में मिलाकर लगाने से त्वचा की स्थिति में सुधार देखा गया है।
दांतों की मजबूती और मौखिक स्वास्थ्य
बेशर्म का पौधा केवल बाहरी शारीरिक समस्याओं के लिए ही नहीं, बल्कि मुंह के स्वास्थ्य को बनाए रखने में भी सहायक है। इसकी टहनी का उपयोग लोग दातून की तरह करते हैं। बेशर्म की दातून मसूड़ों की सूजन को कम करने में मदद करती है और मुंह की दुर्गंध को जड़ से खत्म करती है। ग्रामीण परंपरा के अनुसार, इसके नियमित इस्तेमाल से जबड़ों की हड्डी मजबूत होती है और दांतों में कीड़े लगने की संभावना कम हो जाती है। यह पायरिया और दांतों की सड़न जैसी बीमारियों के खिलाफ एक मजबूत ढाल का काम करता है।
घावों को भरने में मददगार
घाव को तेजी से भरने और संक्रमण को रोकने के लिए बेशर्म के पौधे में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और एंटीमाइक्रोबियल तत्व बहुत लाभकारी हैं। गहरे घाव होने पर ग्रामीण लोग इसकी पत्तियों का रस निकालकर सीधे घाव वाले स्थान पर लगाते हैं। इससे न केवल खून बहना रुकने या दर्द कम होने में सहायता मिलती है, बल्कि संक्रमण का खतरा भी न्यूनतम हो जाता है। पुराने घावों के उपचार में भी इस पौधे को काफी कारगर माना गया है। हालांकि यह पौधा अपने औषधीय गुणों के साथ-साथ जहरीला भी होता है, इसीलिए पशु इसे नहीं खाते हैं। इसकी पत्तियां, टहनियां और इसका सफेद दूध, सभी अलग-अलग तरह से औषधीय कार्यों में उपयोग किए जाते हैं, जो इसे देसी दवाओं का एक अनूठा खजाना बनाते हैं।
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