F&O मार्केट में बड़े बदलाव की आहट
शेयर बाजार में फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस यानी F&O ट्रेडिंग करने वाले निवेशकों के लिए भविष्य में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। बाजार नियामक संस्था SEBI अब केवल साप्ताहिक और मासिक कॉन्ट्रैक्ट्स के दायरे से आगे बढ़कर लंबी अवधि के यानी लॉन्ग-टर्म F&O कॉन्ट्रैक्ट्स को प्रोत्साहित करने की तैयारी में है। बाजार के जानकारों का मानना है कि इस कदम से न केवल ट्रेडिंग की दिशा बदलेगी, बल्कि निवेशकों के लिए जोखिम प्रबंधन यानी रिस्क मैनेजमेंट के नए और बेहतर रास्ते खुल जाएंगे।
लंबी अवधि की रणनीति पर जोर
SEBI के चेयरमैन तुहिन कांत पांडेय ने हाल ही में इस विषय पर संकेत दिए हैं कि भारतीय डेरिवेटिव बाजार को अब लंबी अवधि के कॉन्ट्रैक्ट्स की आवश्यकता है। नियामक का स्पष्ट मानना है कि वर्तमान में F&O बाजार का एक बड़ा हिस्सा केवल शॉर्ट-टर्म ट्रेडिंग और सट्टेबाजी तक सीमित है। यदि लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स की शुरुआत होती है, तो निवेशक अपनी लंबी अवधि की निवेश योजनाओं को अधिक मजबूती और सटीकता के साथ सुरक्षित यानी हेज कर पाएंगे।
विशेषज्ञों की राय और शर्तें
बाजार के जानकारों ने SEBI के इस नए प्रस्ताव का स्वागत तो किया है, लेकिन साथ ही कुछ महत्वपूर्ण शर्तें भी रखी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ नए कॉन्ट्रैक्ट्स को बाजार में उतार देना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए बाजार में लिक्विडिटी को काफी हद तक बढ़ाना होगा। साथ ही, मार्केट मेकर्स की संख्या में बढ़ोतरी और संस्थागत निवेशकों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना इस मॉडल की सफलता के लिए अनिवार्य शर्त है।
मार्जिन नियमों में सुधार की जरूरत
विशेषज्ञों की चिंता का एक बड़ा विषय मार्जिन नियम भी है। वर्तमान में लंबी अवधि के F&O कॉन्ट्रैक्ट्स पर मार्जिन की दर काफी अधिक है, जिससे निवेशकों की कुल लागत बढ़ जाती है। जानकारों का सुझाव है कि यदि SEBI मार्जिन नियमों को सरल और तार्किक बनाता है, तो ये लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स निवेशकों के लिए काफी आकर्षक बन सकते हैं। इसके अलावा, सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) और अन्य लेनदेन संबंधी शुल्कों की समीक्षा करना भी बेहद जरूरी बताया गया है।
इंडेक्स से होगी शुरुआत
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि SEBI सबसे पहले इन कॉन्ट्रैक्ट्स को निफ्टी, सेंसेक्स और अन्य प्रमुख इंडेक्स पर लागू कर सकता है। इन इंडेक्स में अस्थिरता तुलनात्मक रूप से कम होती है और इनमें कीमतों के साथ छेड़छाड़ की आशंका भी बहुत कम रहती है। पहले चरण की सफलता के बाद इसे चुनिंदा बड़े और अधिक लिक्विड शेयरों तक विस्तारित किया जा सकता है।
क्या निवेश का तरीका बदल जाएगा?
भले ही लॉन्ग-टर्म F&O कॉन्ट्रैक्ट्स, साप्ताहिक एक्सपायरी वाले कॉन्ट्रैक्ट्स की तरह लोकप्रिय न हो पाएं, लेकिन ये म्यूचुअल फंड, पेंशन फंड और बड़े संस्थागत निवेशकों के लिए जोखिम कम करने का एक प्रभावी हथियार साबित होंगे। यदि SEBI की यह योजना धरातल पर उतरती है, तो भारतीय डेरिवेटिव बाजार एक नए और परिपक्व दौर में प्रवेश कर सकता है।
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