घरेलू विनिर्माण को रफ्तार देने और आयात पर निर्भरता घटाने के मकसद से सरकार ने छह प्रमुख क्षेत्रों पर खास ध्यान देने का फैसला किया है। इसके लिए अलग-अलग कार्य समूह (टास्क ग्रुप) बनाए गए हैं, जो ऐसे 100 उत्पादों की पहचान करेंगे जिनका निर्माण देश के भीतर ही बढ़ाया जा सके।
मामले से जुड़े एक अधिकारी के मुताबिक इस पहल का असली उद्देश्य इन उत्पादों के स्वदेशीकरण को बढ़ाना और बाहर से होने वाली खरीद पर निर्भरता को कम करना है। ये समूह इसी मकसद से उत्पादों की सूची पर मंथन करेंगे और तीन हफ्ते के भीतर अपनी अंतिम सूची कैबिनेट सचिवालय को सौंप देंगे।
ये हैं चुने गए 6 सेक्टर
सरकार ने जिन छह क्षेत्रों को इस योजना के लिए चुना है, उनमें फार्मास्युटिकल्स, बायोटेक और मेडिकल डिवाइसेज, केमिकल्स और पेट्रोकेमिकल्स, वस्त्र और फुटवियर, पूंजीगत वस्तुएं, ऑटोमोटिव और इलेक्ट्रिक वाहन, एडवांस कैपिटल प्रोडक्ट, ऊर्जा, निर्माण उपकरण और इन्फ्रास्ट्रक्चर, रक्षा एवं एयरोस्पेस (केवल नागरिक उपयोग के लिए) तथा इलेक्ट्रॉनिक्स शामिल हैं।
इन कार्य समूहों में अलग-अलग मंत्रालयों और विभागों के सदस्य रखे गए हैं। इनमें वाणिज्य, डीपीआईआईटी, नीति आयोग, फार्मास्युटिकल्स, आर्थिक मामले, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, केमिकल्स, वस्त्र, भारी उद्योग, पोर्ट्स एवं शिपिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी, सड़क परिवहन, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा तथा तेल विभाग प्रमुख हैं।
कैसे घटेगी आयात पर निर्भरता
इन सभी समूहों की अध्यक्षता उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (डीपीआईआईटी) के सचिव करेंगे। ये समूह ऐसे उत्पादों को चिह्नित करेंगे जो या तो भारत में बनते ही नहीं हैं या फिर देश की जरूरत के मुताबिक पर्याप्त मात्रा में नहीं बनाए जाते।
इस कदम का लक्ष्य घरेलू और वैश्विक, दोनों बाजारों के लिए विनिर्माण का दायरा बढ़ाना है। साथ ही इसका मकसद विदेशी मुद्रा के बाहर जाने पर लगाम लगाना भी है, क्योंकि इसका सीधा असर भारतीय मुद्रा के मूल्य पर पड़ रहा है। आंकड़ों के मुताबिक 2025-26 में भारत का आयात 7.5 फीसदी बढ़कर 775 अरब डॉलर पर पहुंच गया।
कहां खर्च हो रहा है देश का पैसा
पिछले वित्तवर्ष में भारत ने जिन प्रमुख उत्पादों का आयात किया, उनमें कच्चा तेल सबसे ऊपर रहा, जिस पर 174 अरब डॉलर खर्च हुए। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक सामान पर 116.2 अरब डॉलर और मशीनरी पर 61.73 अरब डॉलर का आयात बिल बना।
- वनस्पति तेल: 19.5 अरब डॉलर
- उर्वरक: 16 अरब डॉलर
- अयस्क और खनिज: 14.12 अरब डॉलर
- कोयला, कोक और ब्रिकेट्स: 27.9 अरब डॉलर
- केमिकल्स: लगभग 28 अरब डॉलर
- कृत्रिम रेजिन और प्लास्टिक सामग्री: 22.75 अरब डॉलर
- परिवहन उपकरण: 34.75 अरब डॉलर
सरकार का मानना है कि इन क्षेत्रों में स्वदेशी उत्पादन बढ़ने से न सिर्फ आयात बिल में कमी आएगी, बल्कि निर्यात को भी नई ताकत मिलेगी।
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